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■ चंद्रपुर के तमाम बड़े उद्योगों में भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत
 
■ सरकार महागठबंधन की और लाभान्वित हो रहे भाजपा नेता
पिछले दशक तक राजनीति को जनसेवा का माध्यम समझा जाता था। लेकिन अब वर्तमान राजनीति केवल और केवल करोड़ों का धन बटोरने का माध्यम बन चुकी है। यह हालात लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है। यदि नेता ही अगर ठेकेदार व व्यापारी बन जाएं तो वे निजी लाभ के लिये जनता का बहुमत बेचने से नहीं चुकेंगे। इन दिनों चंद्रपुर और घुग्घुस समेत जिले के तमाम उद्योगों में राजनीतिक पद पर बैठे नेताओं के ठेके धड़ल्ले से चलना राजनीति के काले चेहरे को उजागर कर रहा है। यकीनन यह भाजना व कांग्रेस की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। करीब 3 साल पहले राज्य में महागठबंधन की सरकार बनी। लेकिन अधिकांश ठेके जिले के भाजपा नेताओं की झोली में ही जा रहे हैं। कमीशन व साठगांठ के इस खेल में हर राजनीतिक दल अपना दामन दागदार करने पर तुला हुआ है। यह मौजूदा लोकतंत्र, कामगारों के हक की लड़ाई और प्रदूषण विरोधी आवाजों को कुचलने की आहट है।
राजनीतिक रसूख का गलत इस्तेमाल
जो राजनेता किसी समय में जनसमस्याओं के लिये आंदोलन किया करते थे, वे अब जनता को बरगलाकर सत्ता में आने के बाद उद्योगों पर धाक जमाने लगे और खुद ही कोयला, मजदूर आपूर्ति समेत अन्य करोड़ों के ठेके हासिल करने लगे। अपने रिश्तेदारों और बेहद करीबी समर्थकों के नाम से बने प्रतिष्ठानों के माध्यम से राजनीति को कमाई का जरिया बना दिया है। कोई भी व्यवसाय बुरा नहीं होता, लेकिन राजनीतिक रसूख का गलत इस्तेमाल कर मलाई खाने की नीति के चलते यही नेता अब प्रदूषण के खिलाफ अपने मुंह से एक शब्द भी निकालने के लिये तैयार नहीं है। जो लोग प्रदूषण के विरोध में आवाज उठाना चाहे, उन्हें यही मलाईखोर नेता किसी न किसी तरह से चुप बिठाने का षडयंत्र करने लगे हैं। जो जनता प्रदूषण के कारण नारकीय यातनाएं भोग रही है, वह इसी काली-बदसूरत राजनीति का असर है। प्रदूषण का पाप छिपाने के लिये कांग्रेस-भाजपा का गजब का गठबंधन जिले में नजर आता है।
राजनीति की गंदगी को बयां करती नेताओं की चुप्पी
नेताओं की वर्तमान आर्थिक नीतियां राजनीतिक गलियारों के काले गालिछे को मानो उकेर रही हो। वर्ष 2019 में कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रकाश देवतले ने एसीसी प्रदूषण के खिलाफ जिलाधिकारी से भेंट कर शिकायत की थी। साथ ही विधानसभा में मामला उठाने की चेतावनी दी थी। लेकिन प्रदूषण के विरोध में अब वे कुछ कहने के लिये तैयार नहीं है। वहीं विरोधी दल भाजपा के नेताओं को उद्योगों की ओर से मिल रहे करोड़ों के ठेके प्रदूषण के खिलाफ अपना मुंह बंद रखने के लिये मजबूर कर रहे हैं। इन नेताओं, इनके समर्थकों और विविध गुटों की चुप्पी राजनीति की गंदगी को बयां कर रही है।
व्यापार के लिये राजनीतिक पद क्यों जरूरी ?
बरसों से रिवाज रहा है कि नेताओं के राजनीतिक करिअर के लिये व्यापारी इन्हें मदद किया करते थे। लेकिन अब व्यापारी ही राजनेता बनने लगे। या यूं कहे तो आजकल राजनेता ही अब व्यापारी बन गये हैं। और तो और राजनीति ही अब व्यापार बन गया है। या हम यह भी कह सकते है कि व्यापार करने के लिये राजनीति में पद हासिल किये जा रहे है। भाजपा राज हो या कांग्रेस का राज हो, बड़े-बड़े उद्योगों के भितर के ठेके राजनीतिक दल के नेता आपस में मिल-बांटकर हासिल कर रहे हैं।
राजनीति का दुरुपयोग कब तक ?
राजनीतिक पद हासिल कर जनकल्याण का काम करने के दिखावे की अब धीरे-धीरे पोल खुलने लगी है। राजनीति दल के संगठन में पैठ जमाकर सबसे पहले संगठन का पद हासिल किया जाता है। चंद दिनों बाद अपने समर्थकों का एक खेमा तैयार कर चुनावी टिकट पाया जाता है। जैसे ही चुनाव जीत जाते है, फिर शुरू होती है व्यापार की दुकान। इस दुकान को बाहर से देखने पर सबकुछ अच्छा लगता है। लेकिन इस राजनीतिक दुकान की नींव और अंदर का सामान अर्थात सभी तरह के ठेके खौफ, रसूख, ब्लैकमेलिंग, लाॅबिंग, सेटिंग, सौदा, प्रशासनीक रूकावटों के गलियारों से होकर गुजरती है। यह जिला अब बीते अनेक सालों से राजनीतिक दुरुपयोग का अडडा बन गया है।
इंकम टैक्स डिपार्टमेंट को ध्यान देना होगा
राजनीति में कदम रखते ही भाजपा व कांग्रेस के नेतागण सभी प्रकार के ठेके प्राप्त कर करोड़ों की संपत्ति इकठ्ठा करने लगे हैं। इनकी इस नीति का पर्दाफाश इंकम टैक्स डिपार्टमेंट को करना चाहिये। कोई मामूली कार्यकर्ता राजनीति में इंट्री लेकर चंद सालों में करोड़पति कैसे बन जाता है, इसका जवाब जनता को मिलना चाहिये। ऐसे महान राजनीतिक व्यापारियों व राजनीतिक ठेकेदारों की कहानियां आम जनता के लिये प्रेरणा का स्त्रोत क्यों नहीं बनना चाहिये ? यदि सबकुछ जायज तरीके से चल रहा है तो ईमानदारी से पैसे छापने की इस मशीन का सूत्र बेरोजगारों व शिक्षितों को भी पता चलना चाहिये।
प्रदूषण पर चर्चा करते हैं, आंदोलन नहीं
प्रदूषण के मामले में चाहे भाजपा जिलाध्यक्ष देवराव भोंगले हो या कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रकाश देवतले हो, वे अनेक बार उद्योगों के प्रबंधनों से चर्चा कर उपाय योजना करवाने का दिखावा करते है। लेकिन इस दिखावे की पोल तब खुलती है, जब प्रदूषण सर्वेक्षण की रिपोर्ट राज्य व देश स्तर से घोषित होती है। हर बार चंद्रपुर जिला प्रदूषण की सूची में टॉप करता चला जाता है। इन नेताओं की बंद कमरों की चर्चा केवल उद्योगों पर दबाव बनाकर अपना व्यक्तिगत लाभ उठाने की मंशा को जाहिर करता है। यदि ऐसी मंशा नहीं है तो इन नेताओं ने और इनके राजनीतिक संगठन कांग्रेस-भाजपा ने कभी भी प्रदूषण के विरोध में तीव्र आंदोलन क्यों नहीं किया, इस बारे में जनता को गंभीरता से सोचना चाहिये।
चंद्रपुर की आबोहवा जहरीली
इन दिनों जिले के इंडस्ट्रियों के प्रदूषण का मुद्दा गरमाया हुआ है। प्रदूषण के मामले चंद्रपुर की आबोहवा जहरीली हो चुकी है। लेकिन जिले के तमाम राजनीतिक दल कांग्रेस, भाजपा, राकांपा, शिवसेना, मनसे, बसपा, वंचित, आप पार्टी, सपा, एआईएमआईएम आदि अपेक्षा के अनुसार प्रदूषण के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाने या आंदोलन करने के मुड में नजर नहीं आते। इन निजी उद्योगों में इन्हीं राजनीतिक दलों के नेताओं के विविध ठेके चल रहे हैं। कांग्रेस हो या भाजपा सभी नेता मिल-जुलकर ठेकों की मलाई खा रहे हैं। और जनता को प्रदूषण का जहर लगातार परोसा जा रहा है।
चंद रोजगार दिलाने लाखों को कर रहे बीमार
गत 25-30 सालों में चंद्रपुर, घुग्घुस, तड़ाली आदि इलाकों में बड़े पैमाने पर उद्योग लगाये गये। इन उद्योगों से भले ही चंद हजार युवाओं को रोजगार मिला हो, लेकिन करीब 10 लाख बेकसूर नागरिकों को प्रदूषण का जहर परोसा जा रहा हैं। जनता की आयु कम करने की नौबत ला दी गई है। प्रदूषण के कारण श्वसन से संबंधित विविध बीमारियां गंभीर रूप ले चुकी है। लोगों के इलाज का खर्च बढ़ गया है। लेकिन जनता के जान के बदले में कुछ नहीं मिला। विकास व सीएसआर फंड के नाम पर जनता को बरगलाया जा रहा है। जिंदगी बर्बाद करने की कीमत पर विकास के कार्यों को अब जायज नहीं ठहराया जा सकता।
प्रदूषण का विरोध क्यों नहीं कर रहे नेता?
अब जब चंद्रपुर प्रदूषण के मामले में फिर एक बार बदनामी के टॉप लिस्ट में शुमार हो चुका है। ऐसे में जिले के भाजपा व कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के नेता इस प्रदूषण के कलंक को मिटाने के लिये कोई पुख्ता कदम क्यों नहीं उठा पा रहे है ? क्यों इन निजी उद्योगों से मिलने वाले कोयले के ठेके, मजदूरों की आपूर्ति के ठेके, सामग्री आपूर्ति के ठेके इन नेताओं का मुंह बंद रखने के लिये मजबूर कर रही है।
नेता क्यों बन गये ठेकेदार-व्यापारी ?
हर व्यक्ति को व्यवसाय करने का संवैधानिक हक है। नेताओं द्वारा किये जा रहे व्यवसाय भले ही अवैध नहीं हो, लेकिन राजनीतिक पद मिलने के बाद अचानक अपने कार्यक्षेत्र के उद्योगों में ठेके क्यों व कैसे मिल रहे हैं, यह एक गंभीर जांच का विषय है। राजनीतिक पद और सत्ता के बदौलत उद्योगों में पैठ जमाना किस बात का परिचायक है ? उद्योगों में बरसों से ठेके और व्यवसाय करने वाले परंपरागत व्यवसायिकों को बाहर का रास्ता दिखाकर नेतागण अगर खुद ही ठेके हासिल करने की नीति अपना रहे है तो वर्तमान राजनीति के चेहरे को साफ-साफ देखना-परख लेना जरूरी बन जाता है। उद्योगों में कोयले के डीओ, मजदूर आपूर्ति, कोल ब्रेकिंग व मेंटनंस आदि के ठेके बरसों से भाजपा व कांग्रेस के नेताओं को प्राप्त होने की जानकारी उजागर हुई है।

सत्ता कांग्रेस की, ठेके मिल रहे भाजपा को !

कांग्रेस में बरसों से निष्ठावान होकर काम करने वाले कार्यकर्ता आज भी ज्यों की त्यों हालातों में जीवन बसर कर रहे हैं। आज जिले के अधिकतर ठेके, काँग्रेस की सत्ता होने के बावजूद भाजपा के स्थानिक नेते को मिल रहे हैं, कांग्रेस के मंत्री एवं नेताओं के पीछे झंडे लेकर घूमना, नारे लगाना, सभाओं में तालियां बजाना, दरी उठाना, स्वागत करना, नाश्ता बांटना आदि काम इन कार्यकर्ताओं को दिये किया जा रहा है। कांग्रेस समर्थक ठेकेदार और व्यापारी इन नेताओं के दरवाजों पर चप्पल घिस-घिसकर थक गये हैं, लेकिन कांग्रेस राज में कांग्रेस के समर्थकों को ही ठेके और विविध कामों से वंचित रखा जा रहा है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं की भक्ति पर अब गंभीर रूप से चिंतन करना चाहिये।

– लिमेश जंगम

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